छत्तीसगढ़ के जंगल में हाथी के बच्चे की छट्ठी
रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ के धर्मजयगढ़ के गनपतपुर और ससकोबा के बीच बने एक पुल के एक सिरे पर पहाड़ी जंगल की सीमा है. 29 सितंबर की सुबह, वहाँ इकतीस हाथियों का दल बैठा था, और उसके बीच था हाथी का एक नवजात शावक. दूसरे सिरे पर गाँव वाले खड़े थे, वही लोग जिनके धान के खेतों को यह दल पिछले एक महीने से नुकसान पहुँचा रहा है. उनके हाथों में लाठी-डंडे नहीं थे. हाथों में पूजा की थाली थी. जिस ज़मीन पर पिछले 23 वर्षों में 218 हाथी मरे हैं, उसी ज़मीन पर उस सुबह एक हाथी के बच्चे की छठ्ठी मनाई जा रही थी.
छत्तीसगढ़ के जिस धरमजयगढ़ में सबसे अधिक हाथी मारे गए हैं, जहाँ हर साल इन हाथियों के कारण सर्वाधिक फसलों का नुकसान होता है और ग्रामीणों के आशियाने उजड़ते हैं, वहाँ के जंगलों से इंसानियत और सह-अस्तित्व की एक ऐसी अनूठी तस्वीर सामने आई है जिसने सबको हैरान कर दिया है. यह कहानी किसी दफ्तर के आंकड़ों की नहीं, बल्कि धरमजयगढ़ वनमंडल के बाकारूमा परिक्षेत्र की है, जहाँ पिछले एक महीने से 31 हाथियों का यह विशाल दल यहाँ के जंगलों और गाँवों के आसपास घूम रहा है. खेतों में धान की फसल खड़ी है, और किसान जानते हैं कि हाथियों का एक झुंड एक रात में कितना नुकसान कर सकता है. ऐसे माहौल में गाँवों में चिंता और दहशत स्वाभाविक है.
इसी तनाव के बीच ससकोबा बीट के जंगल से एक खबर आई. दल की एक हथिनी ने कुछ दिन पहले एक शावक को जन्म दिया था. शावक को शायद पता नहीं था कि वह किस ज़मीन पर आया है.
हाथियों की कब्रगाह रहा है धर्मजयगढ़
रिकॉर्ड के अनुसार पिछले 23 वर्षों में छत्तीसगढ़ में विभिन्न कारणों से 218 हाथियों की मौत हुई है. इनमें 84 मौतें मानवीय कारणों से हुईं. उनमें भी 76 हाथी बिजली के करंट से मरे, यानी उन तारों से जो खेतों की सुरक्षा के लिए बिछाए गए थे. जहर से 5, शिकार से 2, प्रतिशोध में हुई हत्या से 1 और वाहन दुर्घटना से 1 हाथी की जान गई. मृत्यु का सबसे बड़ा कारण बिजली का झटका रहा.
पूरे राज्य में सबसे ज़्यादा 58 हाथियों की मौत धरमजयगढ़ में दर्ज हुई और इनमें से अधिकांश करंट लगने से हुईं.
संघर्ष का दूसरा पक्ष भी उतना ही भारी है. हाथियों के हमलों में अपनों को खो चुके ग्रामीणों का दर्द किसी आँकड़े में नहीं समाता. इन 23 सालों में धर्मजयगढ़ में 105 लोग मारे गए. इसी तरह हाथियों द्वारा फसलों का नुकसान किसानों की सालभर की मेहनत का नुकसान है. 2019 का एक विस्तृत आंकड़ा हमारे पास उपलब्ध है, जिसके अनुसार धर्मजयगढ़ के इलाके में हाथियों से फसल और संपत्ति नुकसान के चार हज़ार सात सौ पच्चासी मामले दर्ज किए गये थे. अगर इस आंकड़े का गणित निकाला जाए, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं. इसका मतलब था कि इस क्षेत्र में हर दिन लगभग 13 मामले सामने आ रहे थे, यानी हर दो घंटे में कोई न कोई किसान अपनी फसल खो रहा था या किसी का आशियाना टूट रहा था. हर 120 मिनट में एक परिवार तबाही के मुहाने पर खड़ा हो जाता था.
ऐसी ज़मीन पर एक नवजात हाथी का आना ग्रामीणों के लिए गुस्से की एक और वजह बन सकता था. पर हुआ उल्टा.
छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचल में बच्चे के जन्म के छठे दिन छठ्ठी मनाई जाती है. जब ग्रामीणों को पता चला कि ससकोबा के जंगल में एक ‘छोटा हाथी’ आया है, तो उन्होंने तय किया कि परेशानियाँ अपनी जगह हैं, पर यह नन्हा मेहमान उनके अपने जंगल का है. गनपतपुर और ससकोबा के बीच के पुल के पास के जंगल में पूजा की थाली सजाकर जुटे. पूरे विधि-विधान से पूजा हुई. हल्दी, चावल और फूलों से प्रकृति का आभार जताया गया, पत्तों के दोनों में प्रसाद बँटा, और दूर जंगल की ओर देखकर हाथ जोड़े गए कि शावक दीर्घायु हो.
जानवरों की करें सुरक्षा
इस भावुक दृश्य के पीछे वन विभाग की टीम पूरी तरह सतर्क थी, और इसकी ठोस वजह है. विशेषज्ञों के अनुसार शावक के जन्म के बाद झुंड की गतिविधियों में संवेदनशीलता बढ़ सकती है. हाथी मादाओं के नेतृत्व में झुंडों में रहते हैं, और नवजात की सुरक्षा पूरे दल की साझा ज़िम्मेदारी होती है. जन्म के बाद के दिनों में किसी अनजान आहट पर झुंड तीखी प्रतिक्रिया दे सकता है.
इसीलिए विभाग की मैदानी टीम हाथियों की गतिविधियों पर लगातार नज़र रखे रही. ग्रामीणों को सलाह दी गई कि वे सुरक्षित दूरी बनाए रखें, जंगल में अनावश्यक प्रवेश न करें, हाथियों को न उकसाएँ और उनके रास्ते में बाधा न डालें. उस दिन न भीड़ में हड़बड़ी दिखी, न हाथियों के दल में कोई आक्रामकता. आयोजन शांति से पूरा हुआ.
हालांकि इस एक दिन से चुनौतियाँ खत्म नहीं होतीं. बाकारूमा के किसानों के सामने फसल बचाने की चिंता बनी हुई है. वन विभाग के सामने दोहरा काम है- मानव सुरक्षा सुनिश्चित करना और हाथियों के प्राकृतिक आवास और उनके कॉरिडोर को बचाए रखना. और खेतों में बिछाए जा रहे अवैध बिजली के तार, जो 76 हाथियों की जान ले चुके हैं, अब भी सबसे ज़रूरी प्रशासनिक मोर्चा हैं.
धर्मजयगढ़ के सामाजिक कार्यकर्ता सजल कुमार मधु का कहना है कि ग्रामीण और हाथी सहअस्तित्व में रहना स्वीकार कर चुके हैं. लेकिन सबसे बड़ा संकट ये है कि सरकार इन्हीं इलाकों में एक के बाद एक, नए कोयला खदान खोल रही है. ऐसे में मानव-हाथी संघर्ष को रोकना बेहद मुश्किल होता जाएगा.
बहरहाल यह छठ्ठी इसलिए चर्चा में है कि यह टकराव की सबसे तीखी ज़मीन पर हुई. ग्रामीणों ने दिखाया कि नुकसान झेलते हुए भी वन्यजीवों के प्रति सम्मान बचाकर रखा जा सकता है. यह संदेश इसलिए भी अहम है कि जंगल इन लोगों के लिए सिर्फ़ संसाधन नहीं, उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक संवेदनाओं का हिस्सा है.
वह शावक आज ससकोबा की पहाड़ी पगडंडियों पर अपनी माँ के पीछे चलना सीख रहा है. जिस इलाके ने हाथियों की सबसे ज़्यादा मौतें देखी हैं, वहाँ अब एक नई ज़िंदगी चल रही है. उसकी हिफ़ाज़त इस बात पर निर्भर करेगी कि इस एक सुबह की समझ आगे भी कायम रहती है या नहीं.
