औद्योगिक अधोसंरचना में छत्तीसगढ़ फिसड्डी
रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ के लिए एक बुरी खबर है. देश की नीति आयोग ने कहा है कि औद्योगिक अधोसंरचना के मामले में छत्तीसगढ़ देश के बड़े राज्यों में सबसे पीछे है. छत्तीसगढ़ को 25 में से 9.1 अंक मिले हैं, जो बड़े राज्यों में सबसे नीचे है. यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि विकास मॉडल की सबसे बड़ी कमजोरी का संकेत है. छत्तीसगढ़ की कहानी कुछ ऐसी है- जमीन के नीचे दौलत, बिजली की प्रचुरता, जंगलों और खनिजों की ताकत. लेकिन जमीन के ऊपर वह ढांचा नहीं, जो इस संपदा को बड़े निवेश, नए उद्योग और बड़े पैमाने के रोजगार में बदल सके.
नीति आयोग की ताज़ा रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ बुनियादी ढांचे के मामले में बड़े राज्यों में सबसे पीछे है. 25 में से उसे सिर्फ 9.1 अंक मिले हैं. यानी जिस राज्य की पहचान खनिज, कोयला, बिजली और उद्योग से होती है, वही राज्य सड़क, रेल, हवाई संपर्क और डिजिटल ढांचे के मोर्चे पर निवेशकों को सबसे ज्यादा निराश कर रहा है. जब छत्तीसगढ़ के पास निवेश के लिए इतना कुछ है, तो निवेशक यहां तक पहुंचने और यहां टिकने में पीछे क्यों हट रहा है?
जरा तस्वीर को दूसरी तरफ से देखिए. छत्तीसगढ़ कोई गरीब संसाधन-विहीन राज्य नहीं है. देश के खनिज उत्पादन में उसकी बड़ी हिस्सेदारी है. देश के कोयला और लिग्नाइट उत्पादन का करीब 20 फीसदी हिस्सा छत्तीसगढ़ से आता है. धात्विक खनिजों के उत्पादन में भी राज्य की हिस्सेदारी करीब 14 फीसदी है. यानी जमीन के नीचे दौलत की कमी नहीं है. लेकिन इससे आगे जा कर मामला सांय-सांय के बजाय टांय-टांय फिस्स हो जाता है.
नीति आयोग के Investment Friendliness Index में छत्तीसगढ़ को 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 12वां स्थान मिला है. उसका कुल स्कोर 47.5 है और बड़े राज्यों के बीच वह 9वें नंबर पर है. रिपोर्ट खुद छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी ताकत के रूप में उसके संसाधनों और पर्यावरणीय मजबूती को गिनाती है, लेकिन सुधार की सबसे बड़ी जरूरत बुनियादी ढांचे को बताती है.
यानी मामला साफ है- सामान है, लेकिन सामान को बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था कमजोर है. अब रेल की बात करिए. छत्तीसगढ़ देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का करीब 4 फीसदी हिस्सा है, लेकिन देश के कुल रेल नेटवर्क में उसकी हिस्सेदारी करीब 2 फीसदी है. हवाई संपर्क में भी तस्वीर बहुत मजबूत नहीं है. प्रति व्यक्ति एयरपोर्ट क्षमता के मामले में राज्य 23वें स्थान पर है. और डिजिटल लेन-देन तो बड़े राज्यों के औसत से करीब 92 फीसदी नीचे है.
निवेशक के लिए इसका मतलब बहुत सीधा है. फैक्ट्री लगानी है तो माल आएगा कैसे? तैयार माल जाएगा कैसे? कर्मचारी और अधिकारी आएंगे-जाएंगे कैसे? कारोबार डिजिटल तरीके से बढ़ाना है तो इंटरनेट और दूसरी सुविधाएं कितनी भरोसेमंद हैं? निवेश सिर्फ जमीन देने और एमओयू साइन करने से नहीं आता. निवेशक यह भी देखता है कि उसकी फैक्ट्री से निकलने वाला माल बाजार तक कितनी जल्दी और कितने खर्च में पहुंचेगा.
यहीं छत्तीसगढ़ की दूसरी कमजोरी सामने आती है, कारोबारी माहौल. बड़े राज्यों में कारोबार के माहौल के मामले में छत्तीसगढ़ 13वें स्थान पर है. उसका स्कोर 5.7 में से 20 नहीं, बल्कि 20 में से 5.7 है. इसके आगे महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, गुजरात जैसे राज्य तो हैं ही, बल्कि ओडिशा और झारखंड जैसे पड़ोसी राज्य भी कुछ मोर्चों पर उससे आगे दिखाई देते हैं.
प्रति व्यक्ति आय का सवाल
यहां एक और बड़ा सवाल है. छत्तीसगढ़ में उद्योग का हिस्सा राज्य की अर्थव्यवस्था में 52.8 फीसदी है. यानी उद्योग यहां कोई छोटी-मोटी चीज नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा आधार है. फिर भी प्रति व्यक्ति आय करीब 1.2 लाख रुपये है, जो बड़े राज्यों के औसत से लगभग 24 फीसदी कम है. राज्य का निर्यात भी उसके जीएसडीपी का करीब 5.5 फीसदी है, जो बड़े राज्यों के औसत से लगभग 68 फीसदी कम है.
यानी छत्तीसगढ़ में उद्योग है, खनिज है, बिजली है, लेकिन सवाल यह है कि इन सबकी पूरी कीमत राज्य की अर्थव्यवस्था में क्यों नहीं जुड़ पा रही? यही वह जगह है जहां सरकार की नीतियों पर सवाल खड़ा होता है. सरकारी नीतियों के मामले में छत्तीसगढ़ को सिर्फ 2.5 अंक मिले हैं और वह बड़े राज्यों में 14वें स्थान पर है. उससे ऊपर मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, ओडिशा और झारखंड जैसे राज्य हैं.
लेकिन ठहरिए. छत्तीसगढ़ के बारे में सब कुछ बुरा-बुरा ही नहीं है. नियम-कायदे आसान बनाने के मामले में छत्तीसगढ़ नंबर एक है. संस्थागत माहौल के मामले में भी नंबर एक है. उद्योग के पर्यावरणीय मजबूती में वह दूसरे स्थान पर है. यानी सरकार के दरवाजे तक पहुंचने की व्यवस्था खराब नहीं है. नियमों को लेकर तस्वीर भी अच्छी है. संस्थागत व्यवस्था पर भी भरोसा दिखाई देता है.
फिर अड़चन कहां है? अड़चन उस दरवाजे के बाहर है.
रिपोर्ट में जमीन से जुड़े अनुभवों को देखें तो तस्वीर और साफ होती है. कारोबार बंद करने से जुड़ी कानूनी लागत और बिजली की उपलब्धता को लेकर सकारात्मक बातें सामने आई हैं. उद्योगों के लिए बिजली की उपलब्धता अच्छी और कीमतें उचित बताई गई हैं. लेकिन दूसरी तरफ सिंगल विंडो व्यवस्था की मुश्किलें, ई-डॉक्यूमेंटेशन का पूरी तरह लागू न होना, सीमावर्ती इलाकों की सड़कों से जुड़ी लॉजिस्टिक दिक्कतें, डिजिटल ढांचे की कमजोरी और कुशल कामगार तैयार करने की जरूरत जैसी बातें भी सामने आई हैं.
यानी फाइल आगे बढ़ाने की व्यवस्था बनाई गई, लेकिन निवेश की पूरी यात्रा अभी आसान नहीं हुई है.
और यही फर्क है निवेश बुलाने और निवेश टिकाने में.
महिला श्रम में आगे
छत्तीसगढ़ के पास एक और बड़ी ताकत है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. राज्य में महिलाओं की श्रम भागीदारी का अनुपात 58.1 फीसदी है, जो बड़े राज्यों के औसत से करीब 41 फीसदी ज्यादा है. पर्यावरणीय आपदाओं से निपटने की तैयारी को लेकर भी राज्य का आकलन बड़े राज्यों के औसत से बेहतर है.
फिर भी निजी निवेश का प्रवाह बहुत बड़ा नहीं है. रिपोर्ट के मुताबिक देश में आए कुल निजी इक्विटी और वेंचर कैपिटल निवेश में छत्तीसगढ़ की हिस्सेदारी महज 0.02 फीसदी रही. स्टार्टअप और इनक्यूबेशन के मामले में भी राज्य 22वें स्थान पर है.
इसका मतलब यह नहीं कि छत्तीसगढ़ में निवेश नहीं हो रहा. मतलब यह है कि राज्य अपनी क्षमता के मुकाबले जितना निवेश खींच सकता है, उतना खींच नहीं पा रहा. और शायद यही इस पूरी रिपोर्ट का असली संदेश है.
छत्तीसगढ़ की समस्या संसाधनों की कमी नहीं है. समस्या यह है कि कच्चे माल से तैयार माल तक की पूरी कड़ी कितनी मजबूत है. कोयला निकल गया, लेकिन उससे कितने बड़े उद्योग खड़े हुए? लोहा निकल गया, लेकिन उससे कितने बड़े मूल्यवर्धित उत्पाद बने? खनिज बाहर गया, लेकिन स्थानीय स्तर पर कितने रोजगार और कितनी कंपनियां पैदा हुईं? उद्योग लगा, लेकिन उसके आसपास छोटे और मध्यम कारोबार कितने बढ़े?
निवेशक को सिर्फ यह नहीं बताना होगा कि हमारे पास कोयला है. उसे यह भरोसा भी देना होगा कि- आप यहां फैक्ट्री लगाएंगे तो आपका माल समय पर निकलेगा, इंटरनेट चलेगा, सड़क मिलेगी, कुशल कर्मचारी मिलेंगे, मंजूरी वास्तव में समय पर मिलेगी और आपका कारोबार यहां बढ़ सकेगा.
नीति आयोग की रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ का कुल स्कोर 47.5 है. देश में वह 12वें पायदान पर है. यह कोई तबाही का आंकड़ा नहीं है. लेकिन संसाधनों के लिहाज से देखें तो सवाल इससे कहीं बड़ा है.
जिस राज्य के पास इतना खनिज है, वह निवेश की दौड़ में सिर्फ 12वें नंबर पर क्यों है? और सबसे बड़ा सवाल, जब नियमों में छत्तीसगढ़ नंबर एक हो सकता है, संस्थागत व्यवस्था में नंबर एक हो सकता है और संसाधनों में देश के सबसे मजबूत राज्यों में खड़ा हो सकता है, तो फिर बुनियादी ढांचे में सबसे नीचे क्यों?
अगर सड़क, रेल, डिजिटल नेटवर्क, कौशल और सरकारी नीतियों की कमजोर कड़ियां नहीं सुधरीं, तो खतरा यह है कि छत्तीसगढ़ की जमीन से संसाधन निकलते रहेंगे और उनकी असली कमाई कहीं और होती रहेगी. यही इस रिपोर्ट का सबसे कड़वा सवाल है, छत्तीसगढ़ के पास दौलत की कमी नहीं है, लेकिन क्या उसके पास उस दौलत को अपने लोगों की समृद्धि में बदलने की व्यवस्था है?
